पूजा परम्पराक विशिष्टता
महीनाथपुर में श्री दुर्गा पूजाक विशेष परम्परा
आश्विन मासक शुक्लपक्ष में माँ श्री दुर्गा जीक पूजा महीनाथपुरक ज्योतिषी परिवार द्वारा प्रायः दू शताब्दी सँ अधिक समय सँ निरन्तर होइत आबि रहल अछि। श्री दुर्गा जीक पूजा एतय आश्विन शुक्लपक्ष केर पड़िव (प्रथमा तिथि) सँ विजया दशमी धरि विधिवत होइत अछि, जेना अन्यत्र होइत अछि।
मुदा एतय एकटा विशिष्ट परम्परा अछि—भगवान-भगवती सभक प्रतिमा कोजगरा, अर्थात् पूर्णिमा धरि प्रतिष्ठापित रहैत छथि। ई परम्परा अन्यत्र विरल देखबा में अबैत अछि। एतय प्रतिमा विसर्जन कोजगराक प्रात होइत अछि।
विजया दशमी धरि कलश स्थापित रहैत छथि। कलश परहक जयन्तीक वितरण परम्परानुसार विजया दशमी दिन होइत छैक। पूर्व में लोक अपन शिखा (टीक) में जयन्ती बाँधैत छलाह, मुदा वर्तमान समय में शिखा रहिते नहि अछि, जाहि कारणेँ कखनो-कखनो ओहि अवसर पर क्षोभक स्थिति बनि जाइत अछि।
कुल परम्परा आ पूजा आरम्भ
ज्योतिषी परिवार आ पूजा परम्पराक आरम्भ
दू शताब्दी पूर्व एहि परिवारक पुरुखा - स्व. रामचन्द्र झा, कृष्णचन्द्र झा, विन्ध्य नाथ झा,रमानाथ झा, अभय नाथ झा, कमल नाथ झा, मेधा नाथ झा आ हुनकर पूर्वज लोकनि—अपन दलान पर सामूहिक रूपेँ मूर्ति निर्माण कऽ भगवतीक पूजा आरम्भ कयलन्हि।
जगत्जननी माँ श्री दुर्गा जीक कृपा आ आशीर्वाद सँ ई पूजा परम्परा एखनहुँ धरि सुचारु रूपेँ चलि रहल अछि।
कहल जाइत अछि जे एहि परिवारक एक पुरुखा केँ स्वयं माँ दुर्गे दर्शन देने छलथिन्ह। एहि स्थान पर श्री दुर्गा जीक प्राण-प्रतिष्ठा पश्चात् विधिवत पूजा होइत अछि।
एक बेर एहि ज्योतिषी परिवारक एक सदस्य केँ श्री दुर्गा जी अपन उपस्थिति केर प्रमाणस्वरूप मूर्ति में अपन जीभ केर दर्शन करौलन्हि। समय-समय पर परिवारक विभिन्न सदस्यक अनुभवक आधार पर एहन मान्यता बनैत रहल अछि जे एहि परिवार पर माँ दुर्गा जीक विशेष कृपा आ आशीर्वाद प्राप्त अछि।
साक्षात् दिग्दर्शन
माँ दुर्गा जीक कृपा : सन १९४८ केर घटना
सन १९४८ ईस्वी के अग्रहण मास में घटित एकटा घटना माँ दुर्गा जीक कृपाक साक्षात् प्रमाण मानल जाइत अछि।
ज्योतिषी परिवारक एक प्रौढ़ सदस्य केँ होम्योपैथिक उपचारक नीक अनुभव छलन्हि। हुनकर भतीजी केर प्रसव काल पूर्ण भऽ चुकल छल। एक दिन प्रथम सन्ध्या सँ हुनका तीव्र प्रसव पीड़ा आरम्भ भेल। ओहि समय ओ अपन पित्ती होम्योपैथिक औषधि लऽ कऽ भतीजी केँ देलन्हि। ओ स्वयं दलान पर बैसल छलाह, तखने हुनका अनुभव भेल जे माँ दुर्गा जी हलुक थापड़ मारि कऽ कहलन्हि-“xxxवती केँ एखनहि औषधि दियौ, नहि तऽ विलम्ब भेलासँ बच्चाक जन्म मूल नक्षत्र में भऽ जयत, जे अभिघातक सिद्ध हएत।” औषधि देलासँ २०–२५ मिनट में बच्चाक जन्म भऽ गेल। माँ दुर्गा जीक कृपा आ अनुकम्पा सँ ओ संतान एखन सतहत्तरिम वर्षक अवस्था में सफल पारिवारिक जीवन यापन कऽ रहल अछि।
एहन अनेकों अद्भुत आ चमत्कारी अनुभव एहि दुर्गा जी परिवारक अनेक सदस्यक जीवन में समय-समय पर घटैत रहल अछि।
नेपाल नरेशक दूत आ ज्योतिषाचार्य जी
एकटा प्रसंग अछि—नेपालक राजा केर दूत, एहि ज्योतिषी परिवारक ख्याति सुनि, ज्योतिषाचार्य स्व. श्री रामचन्द्र झा जी सँ साक्षात्कार करबाक उद्देश्य सँ महीनाथपुर आयल छल। ओहि समय ज्योतिषाचार्य जी दलान पर नहि, बल्कि पोखरि में स्नान करैत छलाह। दूत हुनकर दर्शनार्थ पोखरि दिस अग्रसर भेल आ बाटे में हुनकर साक्षात्कार भऽ गेल। प्रणाम कयलापछि दूत अपन बंद मुट्ठी में राखल वस्तु केर विषय में पुछलक। ज्योतिषाचार्य जी क्षणभर गणना कयलाक बाद कहलन्हि-“ई लाल रंगक कोनों वस्तु अछि।” ई सुनिते दूत सीधा हुनकर चरण में साष्टांग प्रणाम कऽ देलक। वास्तव में, दूत दलान सँ निकलैत समय फुलवाड़ी सँ गुलाबक फूल तोड़ि अपन मुट्ठी में रखि लेने छल।
एहि ज्योतिषी घरक प्रतिष्ठा सम्पूर्ण मिथिला क्षेत्र—नेपाल-भारत विभाजन सँ पूर्वहिं—भरि विख्यात छल। एहि ठाम दूर-दूर सँ छात्रगण ज्योतिष शिक्षा प्राप्त करबाक लेल आबैत छलाह।
सांस्कृतिक विरासत
नाटक, मेला आ लोक परम्परा
मिथिला में दुर्गा पूजाक समय गामे-गाम नाटक मंचनक परम्परा छल, आ महीनाथपुरो एकर अपवाद नहि रहल। राजा हरिश्चन्द्र नाटक में राजा हरिश्चन्द्र केर भूमिका में स्व. नागेन्द्र चौधरी जीक अभिनय सम्पूर्ण इलाका में प्रसिद्ध छल।
नाटकक अन्तिम दृश्य में हुनकर अभिनय दर्शक सभक आँखि नोर सँ भरि दैत छल। प्रायः प्रत्येक वर्ष एहि नाटकक मंचन केर माँग रहैत छल।
एहि संग-संग अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम—घोड़ा दौड़, हाथी दौड़, आ विभिन्न लोक उत्सव—भी आयोजित होइत रहल। दशमी सँ कोजगरा धरि दुपहरिया समय मेला लगैत छल, जे सम्पूर्ण क्षेत्र लेल आकर्षणक केन्द्र रहैत छल।